14 मई 2008 को ब्रह्मलीन हुए थे महंत रामाश्रय दास जी

गाजीपुर । धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक रूप से समृद्ध जगत विख्यात सिद्धपीठ भुड़कुड़ा मठ के दसवें महंत रामाश्रय दास जी महाराज निर्गुनिया संत परम्परा के महत्वपूर्ण कड़ी थे। सामाजिक समरसता के अग्रदूत के रूप में वह हमेशा छु़आछूत व ऊंचनीच के खिलाफ थे। सत्रहवीं शताब्दी में भुड़कुड़ा वनों से आच्छादित एक छोटा सा गांव/पुरवा था। यहां लगभग सन 1687 के आसपास गुरु और शिष्य का आविर्भाव एक साथ हुआ। कालांतर में बूला साहेब, गुलाल साहेब, और भीखा साहेब की इस संत परंपरा के क्रम में दसवां नाम जुड़ा सन 1919 में जन्मे महंथ रामाश्रय दास का। उनका पदार्पण पन्द्रह वर्ष की आयु में इस क्षेत्र में हुआ। बुजुर्गों के अनुसार रामाश्रय दास बाल्यकाल में रेल मार्ग से काशी जा रहे थे। भूख प्यास से व्याकुल होकर जखनियां स्टेशन पर उतर गए और लोगों ने उन्हें भुड़कुड़ा की ओर भेज दिया। मठ के तत्कालीन महंथ रामबरन दास जी महाराज ने उन्हें मठ परिसर में आश्रय दिया और आगे चलकर शिष्यत्व भी प्रदान किया। सन 1969 में उनके समाधिस्थ होने के पश्चात रामाश्रय दास इस साधना केंद्र रूपी तीर्थस्थल के पीठाधिपति हुए। महंत रामाश्रय दास जी 14 मई 2008 को ब्रह्मलीन हुए। उन्होंने सन 1972 में अपने गुरु के द्वारा आरंभ किए कार्य को आगे बढ़ाते हुए भुड़कुड़ा महाविद्यालय की स्थापना कर ग्रामीण अंचल में रहने वाले अभावग्रस्त छात्रों के लिए उच्च शिक्षा का द्वार खोला। बाद में महाविद्यालय का नाम श्री महंतरामाश्रय दास पीजी कालेज के रूप में हुआ। महाविद्यालय की स्थापना के पीछे उनके मन में धन या यश की कामना नहीं बल्कि समता, स्वतंत्रता और बन्धु भाव के मूल्य पर आधारित समाज की आधारशिला तैयार करना था। रामाश्रय दास जी के अंदर एक सिद्ध सन्त के सारे गुण विद्यमान थे। उनको संतत्व का बोध था उनका व्यवहार प्रशंसा और निंदा से प्रभावित नहीं था। वह संगीत के साथ मानस तथा सनातन साहित्य के मनन चिंतन में गहरी रुचि रखते थे। श्रीरामचरितमानस में नवधा भक्ति का प्रसंग आता है जिसमें नौ प्रकार की भक्ति का वर्णन सन्त कवि तुलसीदास जी ने किया है एक साधक के रूप में रामाश्रय दास जी ने मठ की परंपराओं का निर्वहन करते हुए नवधा भक्ति को साध लिया था। वे सत्संग और भगवत चिंतन में रत निरभिमानी मुखमण्डल, निष्कपट हृदय, इंद्रिय निग्रह, समता, सरलता जैसे गुणों से परिपूर्ण लोभरहित व्यक्तित्व के स्वामी थे। उनके मुखमण्डल पर निश्छल हँसी तैरती रहती थी और बातचीत के दौरान ताली बजाकर ठहाका लगाते थे। उनका साधारण रहन सहन उनके भीतर बैठी असाधारण आत्मा से जनसामान्य का परिचय और मेलजोल कराता था।

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